मजीद अमजद का शुमार उन शो'रा में होता है जिन्होंने ग़ज़लिया तहज़ीब की मदद से शख़्सियत की इस बातनी सिफ़त को दरयाफ़्त किया है जो ख़ारजी दबाव के बा-वजूद शिकस्तगी की मिसाल नहीं बनती। उन्होंने उसी शय को जो उनके लिए एक क़ीमती असासे की हैसियत रखती है, ग़ज़ल के सजाने में इस्तेमाल की है। उनके ग़ज़ल में मौज़ूई ईजाद की जो ख़ूबियाँ दिखाई देती है वो रिवायत की पासदारी और नए तक़ाज़ों की इज़्तियारी रविश का नतीजा हैं। किसी एक से इंहिराफ़ करके शाइरी फ़िक्र जिला नहीं पाती, और न ख़याल की ग़ैर-मरई हालात मरई बना सकती है क्योंकि बग़ैर किसी वसीले के लफ़्ज़ की तख़लीक़ी तवानाई न तो तरकीबों से तशकील में मुआविन हो सकती है और न इस्तिआरों को जन्म दे सकती है। इसीलिए उन्होंने फ़िक्रो-ख़याल की आराइशी खु़सूसियात को भी बईद-अज़-क़यास होने नहीं दिया और न किसी ऐसे ख़याल को नज़्म किया जो मरई हो कर भी ग़ैर-मरई मालूम हो। जब तक शे'र में इंसानी सरिश्त की दमक न पैदा हो वो शेर, शे'र नहीं बन सकता। लफ़्ज़ों के जामिद मजमूए' को शेर नहीं कहा जा सकता। मजीद अमजद की ग़ज़लों में तहय्युर-ख़ेज़ी, मासूमियत, सुबुक-रुई, नर्मी, भिची-भिची ख़्वाहिश और सहमी-सहमी सी कसक मिलती है। इन सबका मजमूई तअस्सुर वो रसमसाता हुआ दर्द है जो उसकी ज़िंदगी के आख़री क्षणों तक अकेलेपन का साथी रहा और अपने हज़ारों पढ़ने वालों को दर्द की वो सौग़ात दे गया जो उसकी तन्हाई, तिश्नगी और अच्छी ज़िंदगी गुज़ारने की ख़्वाहिश से हम-रिश्ता था। वो रस्ता जो इंसानी सरिश्त और जो उस ख़मसा को जगाए रखने के लिए बहुत ज़रूरी है। साहिल अहमद.
मजीद अमजद का शुमार उन शो'रा में होता है जिन्होंने ग़ज़लिया तहज़ीब की मदद से शख़्सियत की इस बातनी सिफ़त को दरयाफ़्त किया है जो ख़ारजी दबाव के बा-वजूद शिकस्तगी की मिसाल नहीं बनती। उन्होंने उसी शय को जो उनके लिए एक क़ीमती असासे की हैसियत रखती है, ग़ज़ल के सजाने में इस्तेमाल की है। उनके ग़ज़ल में मौज़ूई ईजाद की जो ख़ूबियाँ दिखाई देती है वो रिवायत की पासदारी और नए तक़ाज़ों की इज़्तियारी रविश का नतीजा हैं। किसी एक से इंहिराफ़ करके शाइरी फ़िक्र जिला नहीं पाती, और न ख़याल की ग़ैर-मरई हालात मरई बना सकती है क्योंकि बग़ैर किसी वसीले के लफ़्ज़ की तख़लीक़ी तवानाई न तो तरकीबों से तशकील में मुआविन हो सकती है और न इस्तिआरों को जन्म दे सकती है। इसीलिए उन्होंने फ़िक्रो-ख़याल की आराइशी खु़सूसियात को भी बईद-अज़-क़यास होने नहीं दिया और न किसी ऐसे ख़याल को नज़्म किया जो मरई हो कर भी ग़ैर-मरई मालूम हो। जब तक शे'र में इंसानी सरिश्त की दमक न पैदा हो वो शेर, शे'र नहीं बन सकता। लफ़्ज़ों के जामिद मजमूए' को शेर नहीं कहा जा सकता। मजीद अमजद की ग़ज़लों में तहय्युर-ख़ेज़ी, मासूमियत, सुबुक-रुई, नर्मी, भिची-भिची ख़्वाहिश और सहमी-सहमी सी कसक मिलती है। इन सबका मजमूई तअस्सुर वो रसमसाता हुआ दर्द है जो उसकी ज़िंदगी के आख़री क्षणों तक अकेलेपन का साथी रहा और अपने हज़ारों पढ़ने वालों को दर्द की वो सौग़ात दे गया जो उसकी तन्हाई, तिश्नगी और अच्छी ज़िंदगी गुज़ारने की ख़्वाहिश से हम-रिश्ता था। वो रस्ता जो इंसानी सरिश्त और जो उस ख़मसा को जगाए रखने के लिए बहुत ज़रूरी है। साहिल अहमद.
About the Book: प्रसिद्ध उपन्यासकार ओरहान पामुक ने कहा है - "मैंने एक दिन एक किताब पढ़ी और मेरी पूरी जिंदगी बदल गई।" स्टोरीमिरर ने लेखकों और पाठकों को समान रूप से एक अनूठा मंच प्रदान करके लोगों...
सिया सचदेव को सियासत वाले समझने से रहे। सिया के सत् को समझने वालों को ही उन्हें समझने का अधिकार है। उनके होने की गवाही उनकी शफ़्फ़ाक़ और प्रशान्त पाक़ीज़गी है। उर्दू की शायरी में वे हिन्दी की महादेवी...
इस पुस्तक में राजपूताना रियासतों को भारत संघ में मिलाने के समय घटित हुई राजनीतिक एवं प्रशासनिक घटनाओं को विस्तार से लिखा गया है। उस समय भारत में रह गई 565 देशी रियासतों के राजाओं को यह विश्वास...
मुईन निज़ामी निहायत मुहज़ब शख़्स हैं. वो सूफ़ियाने-साफ़ी के सिलसिले के हैं, फ़ारसी के अच्छे आलिम और माहिर हैं; इस पर मुस्तज़ाद ये कि वो बहुत उम्दा शायर भी हैं. ऐसे शख़्स पर लोग रश्क़ करें तो ग़लत न...
'Bonsai का बगीचा' is a poetry collection of 15 unique compositions in which 12 poems are written in Hindi and 3 poems are in English. These pocket size poems depict a unique story of their own...
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